Friday, August 25, 2023

जिंदगी मेरी कहाँ जाके गई है तू ठहर ॥

जिंदगी मेरी कहाँ जाके गई है तू ठहर ॥
ले गई है फिर वहां ,जो छोड़ आया था शहर

है खुदा भी एक ,एक ही आसमां , एक ही ज़मीं
सरहदों पर किस लिए हमने मचाया है कहर   

मारता आया है बरसों बाद भी अक्सर हमें ॥
घुल गया था जो दिलों में लकीरो का जहर

भूल कर भी भूल सकता हूँ भला कैसे उसे ,
वो सताए है मुझे यादों में शामो - सहर

वायदा करके नहीं आये अभी तक क्यों भला ,
यूँ अकेला बैठ कर कब तक गिनूँगा मैं पहर ।

सूखी थी दिल की ज़मीं ,आबाद जो फिर से हुई ,
यूँ लगे है छू गई इसको मुहब्बत की लहर ॥

Thursday, May 7, 2015

आसमां से वो परी उतरी नहीं तो क्या हुआ

चाल सितारों की अभी सीधी नहीं तो क्या हुआ ||
अबके किस्मत आपकी चमकी नहीं तो क्या हुआ ||

फसल उगा दी उल्फतों की इस सीने के खेत में ,
गर हमारे पास ये धरती नहीं तो क्या हुआ ||

जो  हुआ  दीदार  उनका  दूर  से  तो खुश  हुए ,
पास से नज़रें कभी मिलती नहीं तो क्या हुआ |

.
चाहते  हैं  जान  से  बढ़कर  हमें माँ -बाप भी ,
ये अलग है ,जो चली मरजी नहीं तो क्या हुआ ||

ओट कर देंगे किताबों की ,सनम बरसात में ,
आज अपने पास गर छतरी नहीं तो क्या हुआ ||

खाब  में  है वो ,ख्यालों  में  वही  है  सांवली ,
आसमां से वो परी उतरी नहीं तो क्या  हुआ ||

दिल डरा था दोस्तों के साथ महफ़िल में बड़ा ,
वालिदा अगर हमसे झगड़ी नहीं तो क्या हुआ ||

भीगतें तो हैं "नज़ील"हम बारिशों की रुत में ,
बूँद उल्फत की कभी गिरती नहीं तो क्या हुआ |

Monday, April 20, 2015

मुहब्बत के शहर की तलाश है |

मुहब्बत से देखे हमें उस नज़र की तलाशहै |
बीत जाए ज़िन्दगी बस हमसफ़र की तलाश है ||

हैं मकां तो लाखों-हजारों जहाँ में ,मगर हमें,
हो रिश्तों की बुनियाद पे एक घर की तलाश है |

बस जिंदा हैं जिस्म ,अरसा हुआ रूह को मरे हुए
ले जाए जो हमको खुदा तक ,उसी सफ़र की तलाश है |

खो गए  हैं जो गीत मिलते नहीं अब कही हमें ,
पेड़ पर पंछी फिर गाएं,उस सहर की तलाश है |

कौन जाने आई कहाँ से ,बसे है कहाँ ,तभी,
हर किसी को इस मुहब्बत के शहर की तलाश है |

आस्तां  पे  बैठे  क्यों  है  भला  इन्तज़ार  में ,
जब पता है ,उनको किसी और दर की तलाश है |

बहुत जागे हैं रात -दिन मुहब्बत में "नज़ील" हम ,
अब  हमें  सोने  के  लिए  इक  कब्र  की तलाश है

Thursday, April 9, 2015

अल्लाह जो लिखे किस्मत की किताब में |

अल्लाह जो लिखे किस्मत की किताब में |
कोई  कमी  न  रहे  कभी  उस  हिसाब में ||

माना कि बहुत दिलकश अदा है जनाब में |
मालूम है  उसे  हम  भी  हैं  शबाब  में

ख़त  है  लिखा  उसे   इजहारे-इश्क  में पर ,
मै  जानता  हूँ  जो  वो  लिखेंगे जवाब  में||

उनसे  जुदा  हुआ , जिंदगी ही बिखर गई ,
बस   ढूंढता  रहा   उनको   मै  शराब  में ||

पाया   क्या  ,क्या   खोया  है   इश्क   में.
उलझा  रहूँ  इसी  अनसुलझे  हिसाब  में |

उसने  दिया  कभी  नजराना -ए- उंस मुझे,
है आज भी महक उस सूखे गुलाब में ||

वादा  करो  अगर  मुझसे  तो "नजील"मैं,
सोया   रहूँ  उम्र  भर  तेरे  ख्वाब  में

Wednesday, April 8, 2015

बहुत कुछ दांव पे लगाया है ॥

बड़ा मुश्किल उसे मनाया है ॥ 
बहुत कुछ दांव पे लगाया है ॥ 

किसे कहते कि बेवफा है वो ,
हँसा हम पे जिसे बताया है ॥ 

बसा दिल-ओ-दिमाग में वो ही ,
अचानक सामने जो आया है ॥ 

लगे ऐसा हमें खुदा ने उसे ,
हमारे के लिए बनाया है ॥ 

हुआ है एहसास जन्नत का , 
जो माँ ने गोद में सुलाया है ॥ 

कहाँ होशो-हवास की बातें ,
किसी पे जब शबाब आया है ॥ 

लगे है वो पवित्र गंगा सा ,
करिंदा जो पसीने से नहाया है ॥

Thursday, April 2, 2015

वो सताए है मुझे यादों में शामो - सहर

जिंदगी मेरी कहाँ जाके गई है तू ठहर ॥
ले गई है फिर वहां ,जो छोड़ आया था  शहर

है खुदा भी एक ,एक ही आसमां , एक ही  ज़मीं
सरहदों पर किस लिए हमने मचाया है  कहर 

मारता आया है बरसों  बाद भी अक्सर  हमें ॥
घुल गया था जो दिलों  में  लकीरो  का जहर

भूल कर भी भूल सकता हूँ भला कैसे  उसे  ,
वो सताए है मुझे यादों में शामो - सहर

वायदा करके नहीं आये अभी तक क्यों  भला ,
यूँ अकेला बैठ कर कब तक  गिनूँगा मैं  पहर ।

सूखी थी दिल की ज़मीं ,आबाद जो  फिर से हुई ,
यूँ लगे है छू गई  इसको  मुहब्बत  की  लहर ॥

Sunday, March 29, 2015

वो वायदे गिनने लगे हैं आज कल

खामोश से रहने लगे हैं आजकल ॥
हम रात भर जगने लगे हैं आजकल ॥
इन महफ़िलों को क्या हुआ किसको पता ,
सब  चेहरे ढलने लगे है आजकल ॥
सदियों से लूटा है खुदा के नाम पे ,
तो कब नया ठगने लगे है आज कल ॥
निभते नहीं हैं जो सियासत में कभी ,
वो वायदे गिनने लगे हैं आज कल ॥
कैसे कहें , कितना चाहें हैं उसे ,
बस सोच के डरने लगे हैं आज कल ॥
मालूम होता तो बता पाते तुझे ,
वो दूर क्यों हटने लगे हैं आज कल ॥
अब क्या कहें तुमको कि तेरे ही सबब ,
हम पे सवाल उठने लगे है आज कल ॥

Monday, March 16, 2015

माना होता खुदा को एक हमने

लोगों को लूटने का फ़लसफ़ा होता ||
तो अपने नाम पर बाबा लगा होता ||
तूं तूं - मैं मैं न होती इस कदर हम में ,
तेरा मेरा अगर इक रास्ता होता ||
माना होता खुदा को एक हमने तो ,
फिर घर न कोई किसी का जला होता ||
उनको आया नज़र फर्के- लिबासां ही ,
काश !ये इक रंग का खूं भी दिखा होता ||
फिर मैं भी मानता परवाह है उसको ,
ग़र आंसू पोंछ बांहो में कसा होता ||
समझौता कर लिया हालात से उसने ,
हो जाती जीत ग़र ज़िद पे अड़ा होता||

Monday, April 23, 2012

चौराहे पे हुई इबादत को कम ना आंकिये

झूठ के दौर में भी सदाकत को कम ना आंकिये ।
वतन के लिए हुई शहादत को कम ना आंकिये ।।

झुका देती है अक्सर ही  वो रियासतों  को ,
मजबूर आदमी की बगावत को कम ना आंकिये ।।

बुझ  गए  है  जो  जद्दोज़हद में  आँधियों  से ,
उन चिरागों की शहादत को कम न आंकिये ।।

गिरा देती है अक्सर बड़े-बड़े हाथियों को भी ,
अदानी-सी चींटी की ताकत को कम ना आंकिये ।।

शमा  को  फर्क  पड़े  या  न पड़े कोई बात नहीं ,
परवाने की जल मरने की आदत को कम न आंकिये  ।।

बड़े -बड़े ढेर भी अक्सर राख हो जाते है पलों में  ,
बुझती चिंगारी की  घास से अदावत को  कम ना  आंकिये ।।

ज़रूरी नहीं कि मंदिर जाऊं मैं खुदा के लिए  ,
चौराहे पे हुई इबादत को  कम ना आंकिये ।।

रुसवा करने को काफी होता है एक इशारा ही ,
"नजील" बज़्म में आँखों की शरारत को कम ना आंकिये 
 

Wednesday, March 28, 2012

वो रूठ जाते हैं बेवजह ही

हर दिन ज़िन्दगी से जूझता हूँ |
हर मोड़ पर मंजिलें ढूढता हूँ ||
.
वो रूठ जाते हैं बेवजह ही ,
उनसे भला मैं कब रूठता हूँ |
.
मजबूरी का बनके पासबां मैं ,
अरमान अपने ही लूटता हूँ |
.
अपना गम छुपाने के लिए अब,
मैं हाल औरों से पूछता हूँ |
.
मैं आज नफरत के दौर में भी,
तेरी उल्फ़त कहाँ भूलता हूँ |
.
हर बार फिर उठता हूँ मैं ,चाहे ,
दिन में कई बारी टूटता हूँ ||

Wednesday, March 21, 2012

माहो-अख्तर के बिना आसमां हूँ मैं

माहो-अख्तर के बिना आसमां  हूँ मैं ,
.यादों की बिखरी हुई कहकशां हूँ मैं |

अपने खूं से लिखी हुई दास्ताँ हूँ मैं |
पढने वालों के लिए  इम्तहाँ हूँ मैं |
.
चाहे जिसको लूटना ये ज़हाँ सारा ,
उस दौलत -ऐ-हुस्न का पासबाँ हूँ मैं |
.
छिप सकता है दर्द तेरा ,भला कैसे
तुम्हारे हर राज़ का राज़दां हूँ मैं |
.
या एजद! जाऊं कहीं और मैं कैसे ,
जब तेरे दर का संगे- आस्तां हूँ मैं|
.
कोई भी आकर बसे तो ख़ुशी होगी,
बहुत  वक्त से एक सूना मकां हूँ मैं |
.
माना  लिखता हूँ सुख़न मैं बहुत अच्छा  ,
फिर भी ग़ालिब -सा सुख़नवर कहाँ हूँ मैं |

Wednesday, February 29, 2012

निभाएगी साथ उल्फत जब तलक उनकी ||

जुदाई के नाम आँखे आई छलक उनकी ||
दर्द के अहसास से खुद-ब-खुद झुकी पलक उनकी ||


कभी हारेंगे नहीं हम अपने  दुश्मन ज़हां से ,
निभाएगी साथ उल्फत जब तलक उनकी ||


खुदा जाने ,हाल होगा उनका भी अपने जैसा ,
जिस तरह हम तरसते हैं पाने को झलक उनकी ||


बहाएं अश्क शब् की तन्हाई में बैठ कर वो ,
सुनाए है दास्ताँ अक्सर हमको फलक उनकी ||


"नजील" अब्र भी शर्माए है देखकर ये नज़ारा ,
घटा बन के आसमां पे छाई जो अलक उनकी ||

Tuesday, February 21, 2012

करके दिन रात बन्दगी खुदा से

करके दिन रात बन्दगी खुदा से ||
मांगी  अपनी ज़िन्दगी खुदा से ||
 

डर कैसा है मौत का अब हमें ,
जब है अपनी दोस्ती खुदा से ||
 

इस उम्मीद पर जिन्दा रहे हम
कि वस्ल होगा लाज़मी खुदा से ||
 

छोड़ खुदा को पूजें आदमी को ,
अब ऊंचा हुआ आदमी खुदा से ||
 

बख्श दी है हस के "नजील" हमको,
मांगी थी जो सादगी खुदा से

Wednesday, February 15, 2012

जब हो गए हैं तेरे राजदां हम

मालूम न हुआ कब हुए जवां हम ||
पार कर गए बचपन की आस्तां हम ||


तब भी वालिदा को लगे तिफ्ल ही  ,
करके तरक्की छू लें आसमां हम ||
 

अब ना है कुछ छिपाने की जरूरत ,
जब हो गए हैं तेरे राजदां हम ||
 

उनसे दूर है तो क्या हुआ फिर ,
उनको आज भी भूले हैं
कहाँ हम ||
 

गुजरें है "नजील" उनकी गली से ,
अक्सर देकर इश्क का इम्तिहां हम ||

Tuesday, February 7, 2012

डूबा यादों का सफीना

डूबा यादों का सफीना माजी के बहर में ||
न मिला उसको ढूंढना चाहा हर इक लहर में ||
 

बोला न कोई मुहब्बत से ,हम से दोस्तों ,
हम अजनबी हुए हैं अपने ही शहर में ||
 

गर दे हैं वो ज़हर भी हमको अपने हाथ से ,
लगती है अज़ब  मिठास हमको उनके ज़हर में ||
 

खण्डहर हुए अरमान मेरे साथ वक्त के तो क्या ,
है इक रशिमे-नूर अरमानों के खण्डहर में ||
 

वो पूछें हैं हाल ,मगर बताएं कैसे उसे ,
कैसे महफूज़ रह सकते हैं ऐसे कहर में ||

Monday, January 30, 2012

मेरी नाकाम हुई कोशिशो को सोचता हूँ

मुझ पर चलते दौरे -गर्दिशों को सोचता हूँ ||
उस सबब लगी खुद  पर बंदिशों   को सोचता हूँ ||
 

मजबूरी के सबब हुई न पूरी आज तक  जो ,
मैं दिल में दफ़न उन ख्वाहिशों को सोचता हूँ ||
 

तन्हा, यादों में जब  बैठता हूँ मैं कभी तो ,
उनके साथ  बिताई बारिशों को सोचता हूँ ||
 

सर्द हवाओं के मौसम में  ना जाने क्यों  मैं ,
हर बार तेरी साँसों की तपिशों को सोचता हूँ ||
 

इक छोटे -से झगडे से हुई गलतफहमी  से ,
आज हमारे दरमियाँ रन्जिशों को सोचता हूँ ||
 

अपनी जिंदगी में किसी की मुहब्बत पा सकने की ,
मेरी  नाकाम  हुई   कोशिशो  को  सोचता  हूँ ||

Monday, January 23, 2012

महफूज़ रखी है अपने पास हर शै उनकी


हो जाए है शरारत अक्सर जवानी  में |
आये है मोड़ ऐसा  हर जिन्दगानी में ||
 

किसको कह दे बुरा और किसे कहें अच्छा ,
कोई किरदार ना है अपनी कहानी में |
 

हम  कैसे कामयाब होते अपने मकसद में,
सबसे कमजोर जो थे हम  दिल-सितानी में |
 

आसान किस तरह कहें  सफरे-मुहब्बत को,
आयें लाखों  मुशिकलें इस की रवानी में |
 


महफूज़  रखी है अपने पास हर शै उनकी ,
जो दी थी उसने कभी उल्फत की निशानी में


Tuesday, January 17, 2012

बन कर गुल हम महकते रहे तमाम उम्र

अब्रे-नफरत हम पर बरसते रहे तमाम उम्र |
इक कतरा-ए-उंस को तरसते रहे तमाम उम्र ||
 

चाहे बन कर गुल हम महकते रहे तमाम उम्र |
पर उनकी जुल्फों को तरसते रहे तमाम उम्र||
 

वो ना आये फिर लौटकर आज तक जिंदगी में ,
हम तो उनका इंतज़ार करते रहे तमाम उम्र |
 

उनको भी तो आएगी उल्फ़त हम पर कभी तो ,
बस सोच कर यही हम संवरते रहे तमाम उम्र |
 

सुहबत तो अच्छी थी मगर जानते नहीं हैं हम ,
कैसे  कदम  हमारे  बहकते  रहे  तमाम  उम्र ||


Tuesday, January 10, 2012

शमए-उम्मीदे -वस्ल जलती रही

जाने कितनी शामें हिज़्र में ढलती  रही | 
पर इक शमए-उम्मीदे -वस्ल जलती रही ||

चाहे पा न सके हम कोशिशो  के बाद भी ,
दिल में उनको पाने की मंशा पलती रही ||
 

वक्ते-हनोज़ कटा है जो फुरकते -यार में,
उसमें हमारी रूह तर्हे-मोम पिघलती रही ||
 

छोड़ा ना दिल हमने मुश्किलाते- हियात में ,
कुछ-बादे वक्त इक -इक  होके  टलती रही ||
 

आगाज़े-शिकस्ते-कीमते-दिल जब हुई ,
तो भी अपने दिल की कीमते बढती रही ||
 

माहिर थे  हम फने-दिलसितानी में पर,
उनको न पाने में हमसे  कहाँ गलती रही||
 

खाना-जादे-ज़ुल्फ़ हुए "नज़ील" हम उनके ,
जीना बेहाल हुआ पर साँसे चलती रही ||



Wednesday, December 28, 2011

शायद पड़ गई है दरार दोस्तों के दिलों में ||

छा गई है अब ख़ामोशी -सी हमारी महफिलों में |
शायद  पड़  गई है दरार दोस्तों के दिलों में ||
 
लोग तो डूबा करते हैं अक्सर सागर के बीच ,
मगर हम तो डूब   गए हैं सागर के  साहिलों में |
 
किस से शिकवा करें कि वो काम न आये बुरे वक्त में ,
छोड़ गया साथ खुदा भी हमारा मुश्किलों  में |
 
दोस्त तो बहुत से है हमारे भी इस जहां में मगर ,
फिर भी तन्हा से रहते हैं दोस्तों के काफिलों में |
 
कोई गिला नहीं कि अदावत है जमाने को हमसे  ,
जब अपने ही हुए  है हमारे कातिलों में |
 
आवारा हो गए हैं हम भी इस आशिकी में पड़ कर ,
वरना  "नज़ील" हम भी गिने जाते थे काबिलों में ||


 
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